“मै तुम्हें फिर मिलून्गी” अमृता प्रीतम की मोहब्बत के नाम


तब तक सब कुछ वैसा ही रहेगा 
धरती और आसमान के बीच 
हजारों मर्तबे शुक्कर का तारा 
अपनी शिफ़्ट बदलेगा 
मौसम एक लाइन से लगाते रहेंगे 
हर महीने अपनी हाजिरी 
दुनिया का कोई भी बच्चा 
खेलना नहीं छोड़ॆगा 
कोई भी शै कतई अपने जैसी ही रहेगी 
पारे के लोंदे भारी बने रहेंगे 
और खून में बहते सिर चढ़ जाएं
तो भी 
लतीफ़ा एक भी कम नहीं होना चाहिए दुनिया में 
पेड़ पत्ते बदल लें अगर उन्हें यह रंग नहीं पसंद 
फूलो को देरी हो रही हो किसी और लोक के लिए 
तो बिल्कुल चली जाएँ 
कोई एक पंखुड़ी टंगी रहने दें 

तितलियाँ फूलोँ के इर्द गिर्द अपनी रिहर्सल जारी रखें 
समुद्र कोशिश करते रहें पूनम की रात थोड़ी और ऊपर तक उठ कर 
नदियाँ बेपरवाह बहती रहें ,मिलते बतियाते मछुआरों मल्लाहों से 
अगर कहीं फंसी मेरी डोंगी 
तो पुकार लेंगे 

पहुंच जाएंगे ठीक वक्त और पते पर 
पता तो तुम्हारा तब भी नहीं था 
लेकिन पा तो लिया था
मैं तुमसे फिर मिलुन्गी 
उसी तरह जैसे इस बार 
जैसे हर बार 
पुरवजह संयोग से

कुछ नहीं बीतेगा

न काशी की मणिकर्णिका और डूबती हुई नब्ज़
न झूंसी का तट और आधी रात चमकता हुआ पानी
न भगवानदास रोड का सब वे और दुनिया का सबसे कोमल रास्ता 
न आवारा शाम में फूंकी हुई सिगरेट के छोड़े धुएं का छल्ला
या बीतते अगस्त की दोपहर की निचाट धूप और आँगन में हरी होती जा रही फर्श
न उम्मीद से थक कर सोती हुई नींद में चल रहा सपना
न सपनों की बेतरतीबी का दुःख
या दुःख कहते रुक कर ठीक ठीक बताने की जद्दोजेहद में एक बात का अपना ही छुपाया हुआ एक सिरा
मौत से ठीक पहले पिता से अटके हुए झगड़े का अनसुलझा हल
न कत्थई चोट के बैंगनी होकर फैलते हुए चुपचाप नेपथ्य में पसर जाने की आवाज़
न गले लगाने की आखिरी गर्माहट
न यह कशमकश कि वह उस पर्फ्यूम का असर था
या जाने की उदासी को भींच कर मिटा देने की वैसी ही जिद
पिघलते जा रहे बर्फ को पिघलते जाने देने की लाचारी
या जैसे पत्थर पर लिख न सकने की मजबूरी
न कैमल्सबैक रोड का वह मोड़,जहां ख़त्म होने होने तक
पुराना रास्ता नए में तब्दील हो जाया करता था
न बस की वह आखिरी सीट जो दरअसल यात्रा की शुरुआत का हठ थी
न बालों की पहली सफेदी और अंत की सौम्य मुस्कान
कुछ भी नहीं

जिंदगी तो वो थी – बिस्वावा शिम्बोर्स्का

मेरी मानो 
मत ले जाओ  
इन विदूषको को 
आसमान के पार 

चौदह बेजान ग्रह 
ये थोड़े धूमकेतु 
दो तारे 
और जब तक तुम तीसरे का रुख करोगे 

तुम्हारे विदूषक भूल चुके होंगे 
हंसने हंसाने की बातें 

क्या है कि 
वह लोक 
और इहलोक वाली 
यह दुनिया —
जो है सो हइये है 
माने 
एकदम पूर्ण !

ये मसखरे
इस पूर्णता को 
कभी क्षमा नहीं करेंगे 
लिख लो

उन्हें क्या मजा आएगा 
इन सब में 

इस समय में ( जो न जाने कब से है )
यह सौंदर्य (कोई कमी  ही नहीं जिसमे )
और तुम्हारा यह गुरुत्व ( इसमें कहाँ है कोई गुंजाइश मुस्कराने भर की भी  )
जिस पूर्णता को देख 
लोगों के मुँह 
खुले के खुले रह जाते हैं 

विदूषक जम्हाई लेगा उसे देख कर 

जब तक तुम चौथे तारे की ओर बढ़ोगे
हालात और बिगड़ जाएंगे 
तिरछी मुस्कान, 
बेदार रातें 
और यह मारक संतुलन 

कोई बड़बड़ाता है—
चोंच में रसगुल्ला दबाए वो कौआ याद है 
याद है महाराज के फोटो पर मक्खियों का भनभनाते हगते जाना
झरने में नहाता वो बंदर भी न…

जिंदगी तो वो थी

अनुवाद सत्‍यार्थ अनिरुद्ध

खुदाई – सीमस हिनी

तनी हुई बन्दूक की मानिन्द
मेरे अंगूठे और उंगली के बीच तत्पर -तैनात
ये नन्हा फौलादी कलम

पथरीली ज़मीन को चीरते कुदाल की
खड़खड़ाती आवाज़
खिड़की से साफ़ सुनाई देती है
देखता हूँ उस तरफ़ तो
खुदाई में लगे हैं मेरे बाप

आलू की क्यारियों में तने हुए उनके पुट्ठे
झुकते ही चले गए— नीचे और नीचे
जहाँ लगे थे वे खुदाई में .
आलू खोदते खुरपे से
निकलते चले आए बारी-बारी
एक पर एक
एक लय में बीसों साल

घुटनों के पीछे कुदाल की बेंट
टेक लगाए भिड़ा था पूरे दमखम से
खुरदुरे बूट जमे थे पूरी ताकत से अपनी जगह
कुदाल की चमकती फ़ाल से
अंदर जड़ तक मारते
उखाड़ डाले उन्होंने सब के सब बड़े लम्बे डंठल

फैलाते नये आलू की फसल चारों ओर
जिन्हें उठा कर अपने हाथों में
महसूस करते थे हम
उनकी नर्म ठंडी शक्लें
और सख्त आकार

कसम से ,क्या ही कमाल
चलाते थे वो कुदाल
ठीक अपने बाप की तरह

इस लिसड़ाते पंकिल इलाके में,
पूरे जवार में ,किसी और किसान से
ज्यादा खुदाई कर डालते थे मेरे बाबा एक दिन में

एक बार मैं उनके लिए
कागज़ से जैसे-तैसे फंसाए
ढीले-ढाले ढक्कन वाली
एक बोतल में
दूध लेकर गया
गटकने भर को वो सीधे हुए
और फिर जुट गए खेतों में
एक-एक परत काटते-छांटते-उलीचते
कंधों के ऊपर से
पीछे को फेंकते
ही चले गये ,
एक ही सांस में
जब तक खोज ही न डाली
खेती के लिए मनमाफ़िक मिट्टी

अब मेरे माथे में उग आए
ताज़ी पक्की चोट लिए
कुदाल की धार लगे
सजीव जड़ों से
चेथराए आलूओं की कच्ची गंध
घुसती है नथुनो में
फचफचाते पतवार, चफ़नाए डाढ़ियों-पत्तियों की चपर चपर
सुन पड़ती है.
लेकिन नहीं है मेरे पास उनके रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए कोई कुदाल या खुरपा

बस ये नन्हा फौलादी कलम
टिका है मेरे अंगूठे और उंगली के दरम्यान
करूंगा मैं अब खुदाई इसी से.

अनुवाद – सत्यार्थ अनिरुद्ध

अलस्सुबह – चार्ल्स सिमिक

ओ मेहनती चींटी,चली आओ बिना पूछे
मैं तो बस बैठे विचार कर रहा हूँ कि
क्या करें इस बदराए कारे दिन को ?

रात गाता रहा रेडिओ मद्धम सुर में
नींद उचटती रही
आते रहे अबूझ डरावने सपने.

उठा तो अहमक सा प्रेमातुर
भटका सा खुदी में.

लगा जैसे एस्टेला बागीचे में गुनगुना रही है कुछ
और कोई चिड़िया छेड़ रही है जवाबी तान ,
लेकिन दरअसल वह बारिश की आवाज़ थी .
पेड़ों की डालियाँ अपनी फुनगियों संग झूम रहीं थीं
कुछ बुदबुदाते. मैंने पुकारा
“ मेरे पास आओ मेरी आरजू “
और वह आई हौले हौले,
सुवासित श्वांस, चूम कर नम करती मेरे गालों को
वह आई और फिर खो गई,
धीरे धीरे दिन चढ़ा तो
नहलाती आई
दिन की एक धूसर किरण
मेरी बांहों और चेहरे को.

पहर बीता तो तुम दरवाजे से सरक कर
ठहर गई मेरे सामने.

लगता है तुम उन्ही दर्जियों के पास फिरती हो
जहां जाते हैं शोकग्रस्त परिजन.
ओ चींटी !
मुझे अच्छी लगती है हमारे बीच की ये चुप्पी
नीरव—इतनी पवित्र प्रशांति ,जिसे बारिश भी खूब जानती है.
सुनो उसे शुरू से सुनो,बरसने को है
मानों आँखें मूंदे
धकधक धकधक धड़कते ह्रदय में चुप कराती सहलाती एक एक बूँद बारिश .

अनुवाद - सत्यार्थ अनिरुद्ध

हमारे दौर के बच्चे

पोलिश कवयित्री और नोबल पुरस्कार से सम्मानित विस्वावा शिम्बोर्स्का जी की एक कविता….

हम इस दौर के बच्चे हैं
इस सियासी दौर के

दिन भर और फिर पूरी रात
मेरी,तेरी, उसकी बात-
सब -महज एक राजनीतिक मसला है.

तुम्हें पसंद आये या न आये
लेकिन तुम्हारे खून का एक राजनीतिक इतिहास है
तुम्हारी त्वचा, एक सियासी साँचे से गढ़ी हुई है
और तुम्हारी आंखें एक सियासी निगाह हैं

तुम जो भी कहते हो
गूँजता रहता है बार बार
तुम्हारी चुप्पियाँ बोलती रहतीं हैं
खुद ब खुद
चाहे किसी तौर देखो
तुम सिर्फ़ राजनीति बतिया रहे हो

यहाँ तक कि जंगल की तरफ़
जो तुम जा रहे हो
दरअसल वह सियासी ज़मीन पर
की गई एक राजनीतिक पहल है

जिन कविताओं में नहीं की गई
राजनीति पर कोई भी बात
वे भी सियासी कविताएँ ही थीं

देखो इस चमकते पीले माहताब को
जानते हो
अब यह खालिस चाँद नहीं रहा

सवाल यह है कि
रहें कि न रहें
चाहे यह हाजमा बिगाड़ देने वाला सवाल है
लेकिन यह हमेशा से एक सियासी सवाल है

कोई राजनीतिक अर्थ पाने के लिए
अब तो तुम्हें कोई इंसान होने की भी जरुरत नहीं रही
बस थोड़े कच्चे माल की जरूरत है
जैसे कच्चा तेल
या प्रोटीन के थोड़े से पैकेट
या बस एक टेबल
जिसके आकार प्रकार पर
महीनों चर्चा चली
कि जिंदगी और मौत के बीच
मध्यस्थता हम कहाँ करें
गोल टेबल पर या चौकोर टेबल पर

बहरहाल
लोग मिट गए
मवेशी मर गए
तहस नहस कर दिए गए खेत
जैसा कि बरसों बरस से होता आया है
थोड़े कम सियासी सालों में भी.

अनुवाद – सत्यार्थ अनिरुद्ध

एक घुमंतू का सन्देशा – विलियम इ. स्टेफ़ोर्ड

आज तुम्हारे जेलखाने के बाहर खड़ा
अपनी छड़ी ठकठकाता हूं
कि ओ कैदियों सुनो
बाहर तुम्हारे रिश्तेदार रहते हैं
और भाग निकलने के हज़ार रास्ते हैं.

सालों पहले अपनी कोठरी को बन्द रखने का कौशल साध लिया था
मुझे दी गई जंजीर अस्त-व्यस्त थी
और मैने अपनी योजना जेलर को बता दी थी
लेकिन हर बार मेरे पास नई योजनाएँ थीं
या तो नये नये भारी भरकम तालों को तोड़ लिया गया
या कई बार कोई बेवकूफ जेलर खुद ही चाबी भूल कर चला गया.

अन्दर मैंने सपने देखे
सितारों नक्षत्रॊं और ग्रहों को सजा कर तरह तरह के चित्र रचे
तारों से बने उनके चेहरे
और उन चेहरों का वो अन्धेरा
जो देदीप्यमान तारिकाओं के बीच बैठा हुआ था
उन नायकों की तरह
जो वहीं सबसे ज्यादा मौजूद होते हैं
जहाँ उनकी उपस्थिति नहीं दिखती

तो इस तरह आज़ादी हमेशा
मेरे विचारों को कुतरती हुई आई
कि अक्सर खुली पहाड़ियों पर
उजाले में अक्सर

आप अनदेखे गुजर जाते हैं
नहीं देख पाते कि फुर्ती से निकल गया एक जानवर
फिर जब आप मुड़ कर देखते हैं
तो आपको मालूम पड़ता है कि
अरे घास पर कुछ हुआ क्या
और तब आपको एहसास होता है.

दुनिया में हर चीज़ इसी तरह एक इन्तज़ार में है

तो अब आखिर में दो चार बातें
और फिर मैं निकल जाऊंगा

सबको कहो कि अपने अपने नाम याद कर लें
और जब हम दोबारा एक दूसरे को खोज लें तो याद दिलाएं वो नाम
छोटे बच्चों को कहो कि रो लें
और जहाँ कहीं भी जगह मिलती है
अपने हाथ पाँव मोड़कर
सो जाएं.
और अगर हममें से कोई खो जाए
या बिल्कुल आ ही न पाए लौट कर
तो याद रखो
वक़्त आएगा
जब जो भी हमने कहा था
या उम्मीद की थी
वह सब बिल्कुल वाजिब निकलेगा

मैदान की घास में उसी का चेहरा दिखेगा

अनुवाद – सत्यार्थ अनिरुद्ध

चिड़िया की कविता

घर के पीछे पेड़ पर बैठी चिड़िया मेरे खिड़की खोलते ही कैसे उठ कर चली गयी. उसके भय और मेरे अफ़सोस के बीच कोई जगह है क्या.कि चिड़िया वहां दोबारा आ बैठे और उसे दुबारा सुना सकूँ एक कविता.वह पहचान ले कविता में बैठे सारे पंछी. अपने कुल की चिड़िया से बोल बतिया ले.और मेरी थोड़ी सिफारिश कि विराजे रहें वो मेरी कविताओं में,निर्भय हो कर. इस तरह खुली खिड़की छोड़ कर,प्रतीक्षा करें तो
इंतज़ार करने से आएगी क्या चिड़िया की कविता.

टापू

खुशी से भर कर जिस तरह सोचा जा सकता था
मैंने सोचा

उन प्रसंगों को छोड़कर जिनमें खुश होने की वजहें बीत चुकीं
प्रत्येक ,एक-एक बात याद की मैंने
जिन क्षणों में खुशी से आंसूं आ गये थे
उन्हें स्मृति में दोहराता रहा
और सीखने की कोशिश की
कि किस किस तरह ,किन किन रास्तों से
खुशी को बुलाया जा सकता है
या उस तक जाया जा सकता है ..
फिर एकबारगी मैं ठहर गया .

ऎसी भी क्या मुफलिसी …
इस तरह अपनी उदासी का रफू
असल के खर्च से धागे खरीद कर करें

सुई हमने छोड़ दी बालकनी से
सब्जी वालों की हांक
घरेलू औरतों की बातों
दूर से आती हॉर्न की आवाज़
मोबाइल पर बजते एक गाने की धुन
टीवी पर चलते किसी भाषण का शोर
बहुत धीमी आवाज़ में छुप कर बात कर रही एक लड़की की सांय-सांय
जो खेलते हुए बच्चों की चहचहाहट धीमी होने पर सुन पड़ती थी

इन सबके बीचोबीच
एक टापू पर गिरी सुई
आवाज़
बमुश्किलन मुझ तक पहुँचती हुई .

लौटना –एक

वापसी में मैंने कुछ भी नहीं छोड़ा
न रास्ते
न पेड़
न उनकी छायाएं
न मेरे मन में उनकी गंध
न भीगी हुई हरी धूपीली दोपहर के अधूरे अवसान का अकस्मात्

मैंने केवल जगह छोड़ी
केवल एक उदास पानी की नदी पर बना पुल छोड़ा
लौटते हुए

पानी छूट गया हो तो छूट गया हो
उदासी नही
काल की टिक टिक में अचानक उठा उफान नहीं
अपनी बेरुखी में शहर चलता हो तो चलता हो
उसकी चाल का एक स्क्रीन शाट
अब भी मेरे सामानों में सिकुड़ा हुआ पड़ा होगा

एक बेतरतीब में चीज़ों को पड़े रहने दो
तो वो खुद ब खुद नहीं खुलती
–उकता कर
समय देती हैं
समय मांगती हैं

तैयार करती हैं अगले सफ़र के लिए
एक तरतीब
और रख देती हैं जेब में

जैसे कोई पुरजा लिखा हुआ
हिदायतशुदा
कि आदमी अकेले न लौटे

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